कृषि विभाग की अपील, धान की पराली का करे उचित प्रबंधन
धान की पराली नहीं जलाएं, उचित प्रबंधन से पर्यावरण और मिट्टी बचाएं
जिले में करीब 64,030 हेक्टेयर में धान की बुवाई; अनुमानित 40–45 लाख क्विंटल पराली का उत्पादन*
पराली जलाने पर 5 हजार से 30 हजार रुपये तक पर्यावरण क्षतिपूर्ति का प्रावधान
हनुमानगढ़। जिले में इस वर्ष करीब 64,030 हेक्टेयर क्षेत्र में धान की फसल की बुवाई की गई है, जिससे अनुमानित 40–45 लाख क्विंटल पराली का उत्पादन होता है। धान की कटाई के बाद गेहूं की बुवाई के लिए खेत को तुरंत खाली करने की प्रवृत्ति के चलते किसान फसल अवशेष जलाते हैं। इससे पर्यावरण प्रदूषण की स्थिति उत्पन्न होती है। कृषि विभाग ने किसानों से पराली नहीं जलाकर उसका उचित प्रबंधन करने की अपील की है।
फसल अवशेष जलाने की घटनाओं की रोकथाम एवं प्रभावी मॉनिटरिंग के लिए जिला स्तर पर गठित पराली सुरक्षा बल कमेटी के माध्यम से कार्रवाई की जा रही है। उपखंड अधिकारियों को कमेटी का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। कमेटी केद्वारा पराली जलाने की घटनाओं के दौरान उपखंड स्तर पर साप्ताहिक बैठक आयोजित कर रोकथाम, नियंत्रण एवं मॉनिटरिंग से संबंधित गतिविधियों की समीक्षा की जाएगी। नियमों का उल्लंघन करने वालों के विरुद्ध नियमानुसार दंडात्मक एवं प्रतिरोधात्मक कार्रवाई भी सुनिश्चित की जाएगी।
संयुक्त निदेशक श्रीमती यशवंती ने बताया कि कृषकों को पराली के बेहतर उपयोग के लिए भी प्रेरित किया जा रहा है। पराली की गांठ बनाकर उसे बायोमास आधारित पावर प्लांटों में उपयोग करने तथा गौशालाओं में पशु चारे के रूप में उपयोग लेने के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया जाएगा। कृषि विभाग की ओर से विभागीय व्हाट्सऐप समूहों के माध्यम से भी किसानों को फसल अवशेष प्रबंधन से संबंधित तकनीकी जानकारी उपलब्ध करवाई जा रही है।
पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, नई दिल्ली की 6 नवंबर 2024 की अधिसूचना के अनुसार फसल अवशेष जलाने पर पर्यावरण क्षतिपूर्ति के रूप में जुर्माने का प्रावधान किया गया है। इसके तहत दो एकड़ तक के क्षेत्र में पराली जलाने पर 5,000 रुपये, दो से पांच एकड़ तक 10,000 रुपये तथा पांच एकड़ से अधिक क्षेत्र में पराली जलाने पर 30,000 रुपये पर्यावरण क्षतिपूर्ति के रूप में लगाए जा सकते हैं।
कृषि विभाग ने किसानों से अपील की है कि धान की कटाई के बाद फसल अवशेषों को जलाने के बजाय उनका उचित प्रबंधन करें। इससे पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाने के साथ पशुओं के लिए चारे की उपलब्धता बढ़ाने में भी मदद मिलेगी।
